कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

हमारे लिए चिंता की बात क्यों है तबरेज़ अंसारी की मॉब लिंचिंग का मामला?

अब हमलोग इन सब चीजों की परवाह नहीं करते. हम सोचते हैं कि यह तो एक अनाथ मुसलमान लड़के के साथ हुआ है, इससे हमारा क्या संबंध?

आज़ादी अविभाज्य है. नेल्सन मंडेला ने कहा था, ” अगर मेरा कोई भी नागरिक जंजीरों से बंधा है, इसका मतलब है कि मेरे हर नागरिक से जंजीर लिपटी हुई है. और अगर मेरा हर नागरिक जंजीरों से बंधा है, मतलब मुझे भी जंजीरों में जकड़ा गया है.”

बहुत सारी बातें हैं जो मुझे आज के भारत के बारे में परेशान करती हैं. एक बात यह कि आज हम दूसरे लोगों के साथ होने वाली ज्यादतियों को बर्दाश्त करते जा रहे हैं. ट्रेन में एक लड़के को चाकू मार दी जाती है, लेकिन हमें तकलीफ़ नहीं होती, क्योंकि वह लड़का मुस्लिम समुदाय का था. एक युवती के साथ दरिंदगी से बलात्कार किया जाता है, लेकिन हमें गुस्सा नहीं आता, क्योंकि लड़की दलित जाति की थी. एक राज्य के सभी लोगों को क़ैद करके रखा गया है और हमने इसे स्वीकार कर लिया है, क्योंकि वे लोग भारत को अपना देश नहीं मानते. ऐसे ही असम में करीब बीस लाख लोगों की नागरिकता छीन ली गई है और हमें यह बात परेशान नहीं करती, क्योंकि हमारी नज़र में वे लोग घुसपैठिए हैं. (भले ही उनका जन्म भारत में हुआ हो और वे इस देश से कितना भी प्रेम करते हों).

भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली पिछड़ी जातियों, महिलाओं और मुसलमानों को लेकर हमेशा से भेदभाव करती रही है. पहले जाति-संप्रदाय से जुड़े नरसंहार और बलात्कार के मामलों में कुछ लोगों को सजा भी मिल जाती थी, लेकिन हालिया कुछ वर्षों में उनके साथ हमारा पक्षपातपूर्ण रवैया और भी खुला, बेशर्म और ढीठ बनकर सामने आया है. मुस्लिम समुदाय के व्यक्ति को आतंक के आरोप में 14 साल और कभी-कभी 23 सालों तक तब तक जेल में बंद रखा जाता है, जब तक वे निर्दोष साबित ना हो जाएं. वहीं, आतंक का आरोपी अगर हिन्दू हो तो उसे जल्दी ही रिहा कर दिया जाता है और वह चुनकर संसद तक भी पहुंच जाता है. 2013 के मुज़फ्फ़रनगर दंगों के मुक़दमे पूरी तरह से ध्वस्त हो गए और इसे बस नाम मात्र का विरोध झेलना पड़ा.

आपराधिक न्याय प्रणाली का यह भेदभावपूर्ण रवैया मॉब लिंचिंग के मामले में सबसे अधिक दिखता है. हत्यारी भीड़ में शामिल लोग उस पूरे वारदात की वीडियो रिकॉर्डिंग करते हैं और समाज में खुद को हीरो साबित करने की कोशिश करते हैं. ऐसे मामलों में मारे जाने के बाद भी पीड़ित को ही अपराधी घोषित कर दिया जाता है. इसका सबसे ताजा उदाहरण झारखंड पुलिस का वह फ़ैसला है, जिसमें तबरेज़ अंसारी की हत्या करने वाली भीड़ पर “हत्या” की बजाय “ग़ैर इरादतन हत्या” का मुक़दमा दर्ज किया गया है.

तबरेज़ अंसारी बचपन में ही अनाथ हो गया था. इसके बाद उसके चाचा ने उसकी देखभाल की. बड़ा होने के बाद तबरेज़ कमाई के इरादे से पुणे चला गया. 22 साल की उम्र में पक्के तौर पर वेल्डर बनने के बाद तबरेज़ शादी के लिए अपने घर आया. उसके चाचा ने उसकी शादी एक बहुत ही ग़रीब परिवार की लड़की शाइस्ता से तय कर दी थी. शाइस्ता के पिता नशे की लत्त के शिकार थे, इसलिए उन्होंने तबरेज़ की शादी का प्रस्ताव मान लिया, क्योंकि तबरेज़ के चाचा ने दहेज ना लेने की बात की थी. तबरेज़ और उसकी पत्नी को लिंचिंग वाले दिन ही पुणे जाना था. उनका ट्रेन टिकट भी हो चुका था. लेकिन, यह संभव नहीं हो सका.

मैं तबरेज़ अंसारी की हत्या से व्यक्तिगत तौर पर दु:खी और हताश हूं. ख़ास तौर पर तब से जब कारवां-ए-मोहब्बत की टीम ने तबरेज़ के घर का दौरा किया.

उस रात तबरेज़ अपनी चाची से मिलकर लौट रहा था. रास्ते में ही भीड़ ने उसे पकड़ लिया और बिजली के एक खंभे से बांध कर करीब 6 घंटे तक बुरी तरह से उसकी पिटाई की. फिर उससे ज़बरन “जय श्री राम” के नारे लगवाए गए. इस दौरान स्थानीय लोगों ने पुलिस को कई बार फ़ोन किया, लेकिन सुबह होने से पहले पुलिस वहां नहीं पहुंची. पुलिस ने हत्यारी भीड़ के ऊपर चार दिन तक कोई मुक़दमा दर्ज नहीं किया. चार दिन बाद तबरेज़ की मौत होने पर पुलिस ने मुक़दमा दर्ज किया. लेकिन, इसी पुलिस ने तबरेज़ के ऊपर लूट का मुक़दमा बड़ी तत्परता के साथ दर्ज किया था.

घटना के दिन पुलिस तबरेज़ अंसारी को एक स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र लेकर गई. उस समय तक तबरेज़ की खोपड़ी और कई जगह की पसलियां टूट चुकी थी. लेकिन, डॉक्टरों ने मामूली-सा इलाज करने के बाद तबरेज़ को पुलिस के हवाले कर दिया. फिर पुलिस ने उसे हवालात में बंद रखा. इस दौरान तबरेज़ के परिजनों ने पुलिस से मिन्नतें की कि बेहतर इलाज के लिए उसे कुछ समय के लिए परिवार को सौंप दें. परिजनों ने पुलिस को वादा भी किया कि वे इलाज के बाद उसे सही-सलामत पुलिस के हवाले कर देंगे, लेकिन पुलिस इसे नहीं मानी. परिजनों ने हवालात में बंद तबरेज़ की चोरी छिपे एक तस्वीर ले ली. तस्वीर में वह  गंभीर रूप से जख़्मी दिख रहा था.

इसके बाद पुलिस ने तबरेज़ को कोर्ट में पेश किया. यहां जज को तबरेज़ अंसारी का इलाज कराने का आदेश देना चाहिए था, लेकिन इसकी बजाय उसे जेल भेजा गया. जेल के अधिकारियों को भी जज के सामने दबाव डालना चाहिए था कि पहले एक अच्छे अस्पताल में उसका इलाज हो, लेकिन उन्होंने भी ऐसा नहीं किया. परिवार वालों ने एक स्क्रीन के जरिए जेल में बंद तबरेज़ को देखा था. उस वक्त वह दर्द से कराह रहा था और अस्पताल ले जाने की गुहार लगा रहा था. लिंचिंग के चार दिन बाद उसकी मौत हो गई.

पुलिस ने अपने बयान में कहा कि यह सुनियोजित मर्डर का मामला नहीं है. इसी के आधार पर “हत्या” के मुक़दमे को “ग़ैर-इरादतन हत्या” के नाम से दर्ज किया गया. इस मुक़दमे को दर्ज करने आधार एक मेडिकल रिपोर्ट थी, जिसमें कहा गया था कि तबरेज़ की मौत सिर में चोट लगने की वजह से नहीं, बल्कि दिल का दौरा पड़ने की वज़ह से हुई है. पुलिस ने झारखंड सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों की उस जांच को नज़रअंदाज कर दिया, जिसमें तबरेज़ की मौत के पीछे पुलिस अधिकारियों की लापरवाही और डॉक्टरों की चूक को जिम्मेदार ठहराया गया था.

पुलिस ने अपने चार्जशीट में तबरेज़ अंसारी के ऊपर चोरी की “मंशा” का आरोप लगाते हुए भीड़ के अपराध को सही साबित करने की कोशिश की है. लेकिन, लिंचिंग वाली रात को गांव में कोई चोरी हुई ही नहीं थी. इस घटना के वीडियो फुटेज को भी पुलिस ने नज़रअंदाज़ किया. तबरेज़ के चाचा लिंचिंग वाली जगह पर सुबह में गए थे. उन्होंने अपने बयान में कहा कि भीड़ में शामिल एक शख़्स चिल्ला रहा था, “इसे इतना मारो कि मर जाए”.

तबरेज़ की लाश का पोस्ट-मॉर्टम एक ही बार हुआ था. जिस रिपोर्ट में डॉक्टरों ने उसकी मौत का कारण दिल के दौरे को बताया था, वह रिपोर्ट भी इसी पोस्ट-मॉर्टम के ब्यौरे पर आधारित थी. इस मेडिकल रिपोर्ट पर पांच डॉक्टरों के दस्तख़त थे और इनमें से किसी ने भी फोरेंसिक में ट्रेनिंग नहीं ली थी. तबरेज़ की मौत का तात्कालिक कारण दिल का दौरा पड़ना बिल्कुल हो सकता है, लेकिन यह मान लेने से हम उन सभी परिस्थितियों को नज़रअंदाज कर देते हैं, जिसकी वजह से तबरेज़ के अंगों ने काम करना बंद कर दिया था.

मैंने मद्रास मेडिकल कॉलेज में वस्क्यूलर सर्जरी विभाग के रिटायर्ड एचओडी जे. अमालोरपावनाथन से बात की. उन्होंने कहा कि इंसान की खोपड़ी बहुत मजबूत होती है. इसे तोड़ने के लिए काफी ताकत की जरूरत पड़ती है. उन्होंने कहा, “पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि यह व्यक्ति (तबरेज़ अंसारी) भीड़ के हमले से पहले स्वस्थ और सामान्य हालत में था. इसे इस कदर मारा गया कि खोपड़ी टूट गई और दिमाग के भीतर खून का रिसाव हुआ, जिसकी वज़ह से इसकी मौत हुई. आसान शब्दों में कहें तो इसे पीट-पीटकर मार डाला गया.”

इससे क्या पता चलता है? यही कि धार्मिक नफ़रत से लैश एक हत्यारी भीड़ निहत्थे युवा पर हमलावर हो गई. पुलिस, जज, डॉक्टर और जेल के अधिकारियों ने भी तबरेज़ की हत्या को बेशर्म तरीके से उकसाया.

सरकारी अधिकारी इन मामलों में क्यों बार-बार ऐसे पेश आ रहे हैं? क्योंकि अब हमलोग इन सब चीजों की परवाह नहीं करते. हम सोचते हैं कि यह तो एक अनाथ मुसलमान लड़के के साथ हुआ है, इससे हमारा क्या लेना-देना?

मुझे लगता है हम बर्मिंघम जेल से लिखे मार्टिन लूथर किंग के उन शब्दों को भूल गए हैं, जिसमें उन्होंने कहा था, “अन्याय कहीं भी हो, वह हर जगह के न्याय के लिए ख़तरा है…. नियति के एकमात्र लबादे ने हम सभी को बांध रखा है.”

मेरी नियति तबरेज़ और शाइस्ता अंसारी की नियति से बंधी हुई है. जब तक उन्हें न्याय नहीं मिल जाता, मैं भी आज़ाद नहीं हो पाऊंगा.

(लेखक एक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. यह लेख द इंडियन एक्सप्रेस के लिए अंग्रेजी में लिखा गया है, जिसका अनुवाद अभिनव प्रकाश ने किया है.)

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