कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

जाने माने थियेटर निर्देशक एस रघुनंदन ने संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार लेने से किया इनकार, देश में बढ़ती असहिष्णुता को बताया कारण

उन्होंने कहा, "अब ईश्वर और धर्म के नाम पर मॉब लिंचिंग की जा रही है. यहां तक कि खान-पान को लेकर भी लोगों को मारा जा रहा है."

कर्नाटक के जाने माने साहित्यकार और थियेटर निर्देशक एस रघुनंदन ने साल 2018 का संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया है. देश में “ईश्वर और धर्म के नाम पर मॉब लिंचिंग” और विरोधी स्वर वाले बुद्धिजीवियों पर हमले के विरोधस्वरूप इस अवार्ड को लेने से इनकार किया है.

जारी किए गए बयान में एस रघुनंदन ने कहा है कि जब देश में इस तरह के अन्याय हो रहे हैं ऐसे में वे यह अवार्ड नहीं ले सकते.

उन्होंने कहा है, “संगीत नाटक अकादमी एक स्वायत्त संस्था है और सालों से यह अपनी स्वायत्तता के सिद्धांत को बरकरार रखे हुए है.” आगे उन्होंने कहा है, “हालांकि, अब ईश्वर और धर्म के नाम पर मॉब लिंचिंग की जा रही है. यहां तक कि खान-पान को लेकर भी लोगों को मारा जा रहा है.”

2014 में भारतीय जनता पार्टी नीत मोदी सरकार के आने के बाद देश में अल्पसंख्यक खासकर मुसलमानों के ख़िलाफ़ भीड़ की हिंसा के मामले बढ़ गए हैं. 2019 चुनाव परिणाम आने के बाद भी दक्षिणपंथी समूहों द्वारा अल्पसंख्यकों से जय श्री राम का नारा जबरन लगवाने और उससे इनकार करने पर मारने पीटने की ख़बर सामने आती रही है.

अपने बयान में एस रघुनंदन ने देश में बढ़ती असहिष्णुता को लेकर भी बोला है. उन्होंने कहा है, “कन्हैया कुमार जैसे युवा जो देश और दुनिया को एक नई दिशा दे सकते हैं उनके ऊपर राजद्रोह और आपराधिक षड्यंत्र का मुकदमा दर्ज करा दिया गया है. दूसरे बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के ऊपर यूएपीए के जरिए ट्रायल चलाया जा रहा है. इनमें से अधिकतर लोगों को जमानत भी नहीं मिली है और वे अबतक जेलों में बंद हैं. ये ऐसे लोग हैं, जिन्होंने हमेशा से वंचित तबके के लोगों की आवाज़ उठाई है.”

आगे उन्होंने लिखा है, “जो लोग जेलों में बंद हैं उन्होंने शोषित के हक के लिए न्यायालय में लड़ाई लड़ी है, उनकी पीड़ा को लेकर किताबें और लेख लिखे हैं तथा उन्हें अहिंसात्मक रूप से लड़ने की ताकत दी है. उन्होंने हमेशा ही भारतीय संविधान का अनुकरण किया है और इसके सिद्धांतों को आगे बढ़ाने का काम किया है. उन्होंने अपनी लड़ाई अपने फायदे के लिए नहीं लड़ी है, फिर भी वे लोग जेलों में बंद हैं.”

पिछले साल जाने माने मानवाधिकार कार्यकर्ता और अकादमिक जगत के विद्वान सुधा भारद्वाज, वारवरा राव, वर्नोन गोंजाल्विस, अरुण फरेरा और गौतम नवलखा को महाराष्ट्र पुलिस ने नक्सलियों से संबंध के आरोप में गिरफ़्तार किया था. देश के साथ-साथ विदेशों में भी इस गिरफ़्तारी की निंदा की गई थी और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया गया था. इसी तरह की एक कार्रवाई में सीबीआई ने जानी मानी सामाजिक कार्यकर्ता और वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह और उनके पति अरूण ग्रोवर के आवास और कार्यालय पर छापेमारी की थी.

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