कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

भारतीय न्यायतंत्र में लैगिंक भेदभाव मौजूद है – सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा

उच्च न्यायालयों में भी महिलाओं को एएसजी के रूप में नियुक्त नहीं किया जाता है।

रविवार को सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा ने कहा कि क़ानूनी पेशे में “लैंगिक भेदभाव” है और “ऐसी मान्यता है कि महिला न्यायाधीश जटिल से जटिल व्यवसायिक मामलों से निपटने के क़ाबिल नहीं होती हैं।”

लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार, ग़ौरतलब है कि ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के सहयोग से विधि केंद्र के क़ानूनी नीति द्वारा आयोजित कार्यक्रम “क़ानूनी पेशे में महिला” पर एक पैनल चर्चा में बोलते हुए न्यायाधीश इन्दु मल्होत्रा ने अपने संघर्ष के बारे में कहा कि उन्हें ख़ुद को एक वरिष्ठ न्यायाधीश के रूप में स्थापित करने के लिए कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। उन्होंने बताया, “भले ही मैं क़ानूनी पृष्ठभूमि से आई थी,लेकिन फिर भी यह पेशा मेरे लिए आसान नहीं था। मेरे पिता एक वरिष्ठ वकील थेलेकिन जब मैंने वकालत शुरू किया थातो वह उनके करियर के ढलान का वक़्त थाइसलिए मुझे उनसे कोई मुवक्किल विरासत में नहीं मिले। मुझे उनसे जो लाभ मिलावो था बुनियादी ढांचे की समझ और एक विशाल पुस्तकालय जो उन्होंने ख़ुद बनाया था।”

मल्होत्रा ने कहा, “उस समय महिलाओं को काउंसिल के रूप में पहचाना नहीं जाता था और इसलिए मैंने पेशे में पैर जमाने के लिए एओआर (एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड) की परीक्षा दी। एक एओआर के रूप में बीस साल वक़ालत करने के बादजब मैंने वरिष्ठ पदनाम के लिए आवेदन किया तो मुझे मेरे दो दोस्तों ने बताया कि यह एक पुरुष-वर्चस्व वाली जगह है और एक वकील के रूप में मुझे काफ़ी संघर्ष करना होगा क्योंकि ज़्यादातर लोग पुरुष वकीलों द्वारा ही अपने केस का प्रतिनिधित्व करवाना चाहते हैं। मैंने फिर भी आवेदन किया। न्यायाधीशों ने भी मुझे इसके लिए प्रोत्साहित किया था। और आख़िर में एओआर के रूप में मेरे अभ्यास के कुछ तीस साल बाद मुझे एक वरिष्ठ नामित किया गया था।

न्यायपालिका में पुरुष प्रभुत्व पर ज़ोर देते हुए मल्होत्रा ने कहा, “यहां लैंगिक भेदभाव है। लोग सोचते हैं कि महिला न्यायाधीश जटिल व्यावसायिक मामलों से निपटने के क़ाबिल नहीं हैं। कभी-कभी एक वरिष्ठ न्यायाधीश भी कहते नज़र आते हैं कि आपके समझ में यह नहीं आएगा। और इसलिए आपको दोगुना कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी, इसके साथ लड़ना होगा और अपना रास्ता बनाने के लिए भी बहुत संघर्ष करना होगा।”

उन्होंने इस बात पर भी इंगित किया कि भारत की स्वतंत्रता के 60 वर्षों के बाद ही किसी महिला ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के रूप में पदभार संभाला था।

मल्होत्रा ने कहा, “महिलाओं को सॉलिसिटर जनरलएएसजी इत्यादि जैसी पदों के लिए लॉबी करना मुश्किल होता है। स्वतंत्रता के 60 से अधिक वर्षों के बाद 2009 में केवल एक महिला एएसजी नियुक्त की गई थीं। और केवल उनके अपने क़ानूनी कौशल के हिसाब से किसी भी मामले में उच्च राय की वजह से उन्हें यह पद मिला। आम तौर पर उच्च न्यायालयों, जो कि आधार क्षेत्र हैंमें भी महिलाओं को एएसजी के रूप में नियुक्त नहीं किया जाता है। उन्होंने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि ये राजनीतिक पद हैं। लेकिनये विभिन्न प्रकारों के मामलों के अनुभवों और पहचान बनाने के लिए एक बहुत अच्छा मंच भी है।

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