कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

वनाधिकार कानून की लड़ाई में आदिवासियों ने मोदी सरकार पर लगाया लापरवाही करने का आरोप, कहा- इस पर अध्यादेश लाए सरकार

आदिवासी समुदाय ने कहा कि हम किसी भी परिस्थिति में अपना घर जमीन और जंगल नहीं छोड़गे.

वनाधिकार कानून और संबंधित नियमों को लेकर जॉइंट आदिवासी युवा फोरम एवं भारतीय आदिवासी मंच ने केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए एक प्रेस रिलीज़ जारी कर अपनी मांगों को सामने रखा है.

जिसमें यह आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने केस की पैरवी में लापरवाही बरत रही है. कोर्ट की अंतिम चार सुनवाई में सरकार ने अपना पक्ष रखने के लिए कोई वकील नहीं भेजा. प्रेस रिलीज़ में कहा गया है कि हमें ये स्पष्ट रूप से पता नहीं है कि सरकार ये लापरवाही किस लिए कर रही थी.

दरअसल, 13 फरवरी 2019 को देश की सर्वोच्च न्यायालय ने 21 राज्यों की सरकारों को आदेश दिया है कि अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006, के अंतर्गत वन भूमि पर आदिवासियों और पारंपरिक वन निवासी समुदाय के जिन परिवारों के आवेदन निरस्त कर दिए गए हैं, उन्हें 12 जुलाई 2019 तक राज्य सरकारें वन भूमि से बेदखल करें.

हालांकि, सरकार इस फैसले के ख़िलाफ़ 13 जुलाई तक सुप्रीम कोर्ट से स्टे लेकर आई है लेकिन इससे आदिवासी विस्थापन की समस्या का हल नहीं हो रहा है.

2006 का वन अधिकार अधिनियम ये स्पष्ट करता है कि वन पारिस्थितिकी तंत्र के अस्तित्व और स्थिरता के लिए आदिवासी अभिन्न अंग हैं. विकास के नाम पर विस्थापन की प्रक्रिया आदिवासियों को संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रद्दत जीवन जीने के मूल अधिकार का उल्लंघन है.

2 जनवरी 2011 को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्रा की पीठ ने कैलाश एवं अन्य विरुद्ध भारत सरकार मामले में फैसला सुनाते हुए कहा था कि “आदिवासी जो कि भारत की आबादी का लगभग 8% हिस्सा है जो भारत के मूल निवासी हैं और भारत के शेष 92% लोग बाहर से आए हुए लोगों के वंशज हैं.”

इसलिए सुप्रीम कोर्ट का 13 फरवरी 2019 का आदेश इस मुल्क के मूल निवासियों को जंगल से बेदखल करने की साजिश है और जंगल आदिवासियों का जीवन है. तो यह संविधान का अनुच्छेद 21 का भी उल्लंघन है.

जंगल से बेदखली आदिवासियों को उनके पैतृक जमीन, जीवन शैली, परंपरा और उनके पुरखों से दूर करने की साजिश है. यह आदिवासियों के सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार का हनन है.

आदिवासी समाज ने भारत सरकार के सामने  कुछ  मांगें रखी  हैं:

  1. अनुसूचित जनजाति एवं परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006, को सख्ती से लागू किया जाए.
  2. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जिन परिवारों पर विस्थापन का संकट मंडरा रहा है केंद्र सरकार उन्हें जमीन पर मालिकाना हक/पट्टा दिलाने के लिए अध्यादेश लाए.
  3. आदिम समुदायों और जिन परिवारों ने अभी तक जमीन पर मालिकाना हक का दावा नहीं किया है. सरकार उन्हें भी अनुसूचित जनजाति एवं परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006, के तहत मालिकाना हक और वन अधिकार प्रदान करें.
  4. संविधान की पांचवी और छठी अनुसूची को सख्ती से लागू किया जाए.
  5. पारम्परिक ग्रामसभा के अनुसूची 5 के 13(3) (क), 244 (क) 19, (5 और 6) के तहत आदिवासियों एवं वन निवासियों को दिए गए अधिकारों को सुनिश्चित किया जाए.

प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित कर रहे लोगों ने कहा कि आदिवासी समुदाय किसी भी परिस्थिति में अपना घर जमीन और जंगल नहीं छोड़गे और हम सरकार के द्वारा रिव्यू पिटिशन के बाद आए सुप्रीम कोर्ट के स्टे ऑर्डर से भी संतुष्ट नहीं है.

उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि इस मुद्दे पर सरकार एक अध्यादेश लाए और तुरंत आदिवासियों के हित में कार्यवाही की जाए जिससे अगली बार जब सुनवाई हो तो सरकार आदिवासियों को उनके जल जंगल और जमीन से बेदखल ना कर पाए.

इससे भारत के विभाजन के पश्चात होने वाले सबसे बड़े आदिवासी विस्थापन और उनके जीवन पर गहरा रहे संकट को दूर करने में उनकी मदद करें.

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