कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

झूठे मामलों में मुसलमानों को फंसा रही योगी सरकार, रासुका के तहत 150 से ज्यादा लोग जेलों में बंद

आंकड़ो के मुताबिक साल 2017 में उ.प्र में सांप्रदायिक कारणों से 44 लोगों की मौत हुई है, जबकि 540 लोग घायल हुए हैं।

जनता के सवाल:

प्रश्न1. क्या योगी सरकार के राज में रासुका के तहत मुस्लमानों को निशाना बनाने कि कोशिश की जा रही है?

प्रश्न2. क्यों राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर इस देश के नागरिकों को निशाना बनाया जा रहा है?

प्रश्न3. क्या शासन प्रशासन के इस प्रकार के क़दम अमानवीय एवं आपराधिक नहीं हैं?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मार्च 2018 को  कहा था कि उनके सत्ता में आने के बाद उत्तर-प्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा की एक भी वारदात नहीं हुई है। द वायर की रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार ने 10 दिन बाद संसद में सांप्रदायिक हिंसा की वारदातों के आंकड़े पेश किए इस सूची में उत्तर-प्रदेश का नाम सबसे ऊपर है। आंकड़ो के मुताबिक साल 2017 में उ.प्र में सांप्रदायिक कारणों से 44 लोगों की मौत हुई है, जबकि 540 लोग घायल हुए हैं।

बुलंदशहर और सहारनपुर में सांप्रदायिक हिंसा की वारदातों में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली हिंदू युवा वाहिनी और भाजपा के कार्यकर्ताओं का नाम सामने आता है। सरकार ने इन अपराधियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की है। जनवरी 2018 में योगी सरकार ने कहा था कि उत्तर प्रदेश सरकार ने 160 लोगों के ख़िलाफ़ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) लगाया है।

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अंतर्गत देश की सुरक्षा और राष्ट्र के खिलाफ गतिविधियों में शामिल लोगों की गिरफ्तारी की जाती है। इस कानून के तहत कोई वकील या अपील कार्य नहीं करती है। इसी कानून के तहत 2017 में भीम सेना के चंद्रशेखर आज़ाद को भी गिरफ़्तार किया गया था। कानून के तहत व्यक्ति को गिरफ्तारी की सूचना दिए बगैर 10 दिन तक हिरासत में रखा जा सकता है। इसमें गिरफ़्तार व्यक्ति को अपने ख़िलाफ़ सबूत मांगने का अधिकार नहीं होता। साथ ही सरकार को यह अधिकार होता है कि वह गिरफ़्तारी के कारणों की सूचना को जनहित का नाम देकर केवल अपने तक सीमित रख सकती है।

रासुका के तहत गिरफ़्तार किए गए व्यक्तियों की संख्या बहुत अधिक है। लेकिन यहां कुछ ऐसे मामले हैं, जिनमें योगी सरकार द्वारा केवल मुसलमानों को ही गिरफ़्तार किया गया है। पिछले वर्ष 1 अक्टूबर को मुहर्रम था और उसी दौरान हिंदुओं द्वारा दुर्गा विसर्जन किया जाना था। खुफिया सूत्रों ने सांप्रदायिक तनाव की आशंका जताई थी क्योंकि दोनों ही त्योहारों में जुलूस निकाले जाते हैं। लेकिन बावजूद इसके सरकार द्वारा सुरक्षा के कड़े इंतजाम नहीं किए गए। नतीजा यह हुआ कि पथराव और हिंसा की घटनाएं हुई। पुलिस ने जुलूसों में शामिल मुसलमानों को रासुका के तहत गिरफ़्तार कर लिया।

जूही परम पुरवा की बस्ती में दुर्गा विसर्जन के जुलूस की अगुवाई कर रहे हिंदू समाज पार्टी के सदस्यों ने बस्ती के चौराहे पर मुहर्रम का जुलूस रुकवा दिया और वहां गोलियां व पथराव की घटना भी हुई। 35 वर्षीय हाकिम खान ताजिये का जुलूस रोके जाने पर दोनों पक्षों के बीच शांति कराने गए लेकिन पुलिस के आने पर घर लौट आए। लेकिन 2 अक्टूबर की सुबह पुलिस उनके घर आई और उन्हें उठा के ले गई। हाकिम के भाई का कहना है कि उन्हें बेल्ट से पीटा गया और पुलिस ने कहा कि तुम बहुत इस्लाम जिंदाबाद बोलते हो न।

इसी तरह फ़रकुन सिद्दीक़ी को गिरफ़्तार कर लिया गया। फ़रकुन की 12 साल की बेटी को स्कूल छोड़ना पड़ा क्योंकि अध्यापकों ने उसे अपराधी की बेटी कहा और उसके सहपाठियों द्वारा कहा जाने लगा कि मुसलमान आतंकवादी होते है। उनकी पत्नी का कहना है कि सालों से नगर निगम में ठेकेदारी करने वाला व्यक्ति अचानक देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन गया। वे 10 महीने से जेल में बंद हैं, ये धार्मिक भेदभाव नहीं तो और क्या है।

नूर हसन जो बहराइज की जेल में कैद हैं। उनकी पत्नी ने बताया कि वे दिल्ली में रिक्शा चलाते हैं। हर तीसरे महीने घर आते थे। 2 दिसंबर को पुलिस ने उन्हें उठा लिया गया। वे बच्चे को इलाज के लिए डॉक्टर के पास ले गए थे, लेकिन तनाव के कारण क्लिनिक बंद था। वे डॉक्टर की क्लिनिक से वापस लौट रहे थे। नूर की पत्नी खेतों में मजदूरी करती हैं। रोज के 120 रुपये कमा लेती हैं उन्होंने कई जगह से उधार ले कर वकील को नूर हसन को छुड़ाने के 35,000 रुपये दिये हैं। उन्होंने बताया कि बहराइच जेल में उनके पति महीनों से बंद है और परिवार वालों के पास इतने भी पैसे नहीं हैं कि वे नूर से मिलने जा सकें। नूर का परिवार उबले आलू खाने को मजबूर है।

इस तरह के न जाने कितने मामले और है जिनमें किसी भी मुसलमान नागरिकों को पुलिस ने रासुका के तहत गिरफ़्तार करके जेल में बंद किया है। उ.प्र के पुलिस थानों में धार्मिक उत्सव मनाने की मीडिया की आलोचनात्मक रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए योगी ने अगस्त 2017 को कहा था कि अगर मैं सड़क पर नमाज़ नहीं रुकवा सकता तो मुझे थाने में जन्माष्टमी रुकवाने का कोई अधिकार नहीं है। इसी तरह कांवर यात्रियों द्वारा लाउडस्पीकर, रोड शो और गुंडागर्दी करने की ख़बरों पर भी मुख्यमंत्री ने कहा कि वह शिवभक्तों की यात्रा थी कोई शव यात्रा नहीं। धार्मिक भावनाओं का हवाला देकर मुख्यमंत्री योगी ने स्पष्ट कर दिया था कि धार्मिक जश्न कानून से बढ़कर है।

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