कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

“हमें भाजपा विधायक के घर के पास मरने के लिए छोड़ दिया जाए, मर जाएं तो भाजपा सांसद के आवास पर जलाया जाए”- उत्तराखंड के मज़दूरों का दर्द सुन रही है सरकार?

पिछले 4 महीनों से संघर्ष कर रहे रुद्रपुर स्थित इंटार्क के मज़दूरों और परिवार पर बीते 1 दिसम्बर को पुलिस ने हमला किया.

उत्तराखंड के रुद्रपुर स्थित इंटार्क के मज़दूर अपनी मांगों को लेकर पिछले 4 महीनों से संघर्ष कर रहे हैं. यहां के मज़दूरों और मज़दूर कार्यकर्ताओं का आरोप है कि उत्तराखण्ड सरकार उनकी जायज़ मांगों को मानने की बजाए पूंजीपतियों का साथ दे रही है और हर तरह से आंदोलन का दमन करने में लगी है.

पिछले चार महीनों से यहां के मज़दूर कम्पनी द्वारा की जा रही अवैध कटौती और निलम्बन के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं. गौरतलब है कि श्रम आयुक्त के मुताबिक वार्ता के दौरान यह वैध नहीं माना गया, लेकिन सरकार कंपनी के मालिक के ख़िलाफ़ ठोस क़दम उठाने वाले मज़दूरों का ही दमन करने पर उतारू है.

बीते 23 नवंबर से यहां मज़दूर अपने माता-पिता, पत्नी और दुधमुंहे बच्चों के साथ कंपनी के रूद्रपुर और किच्छा गेट पर धरना दिए बैठे हैं. 28 नवंबर से आमरण अनशन शुरू हो चुका है. अनशन पर बैठे अखिलेश, निहारिका और ज़रीना बेगम ने पूरे देश की जनता से एक मार्मिक अपील की है कि “उनके आखिरी समय पर उन्हें स्थानीय भाजपा विधायक राजकुमार ठुकराल के आवास पर मरने के लिए छोड़ दिया जाए. उसके बाद उनके मृत शरीर को पूरे हल्द्वानी शहर में घुमा कर भूतपूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान भाजपा सांसद भगत सिंह कोश्यारी के आवास पर जलाया जाए”.

ज्ञात हो कि 30 नवंबर को यह पत्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी भेजा गया है.

प्रधानमंत्री को भेजी गई चिट्ठी में मज़दूरों ने बताया कि कंपनी के मैंनेजर मनोज रोहिल्ला और वर्मा कहते हैं कि उनके सीधे अरूण जेटली और भाजपा से संबंध हैं और इसलिए कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ नहीं सकता.

मीडिया विजिल की एक ख़बर के मुताबिक़ शनिवार 1 दिसम्बर की दोपहर को पुलिस ने मज़दूरों, महिलाओं और बच्चों के ऊपर किच्छा में हमला कर दिया. पुरूष पुलिसकर्मियों ने महिलाओं को लाठी से पीटा, कपड़े फाड़े, रोते हुए बच्चों को छीन कर अलग कर दिया.

अगले दिन 2 दिसंबर को पूरे सिडकुल में जारी श्रम कानूनों के उल्लंघन एवं सरकार पूंजीपति गठजोड़ के ख़िलाफ़ एक मज़दूर महापंचायत का आह्वान किया गया था. इस महापंचायत में भारी संख्या में सिडकुल के मज़दूरों और महिलाओं ने भाग लिया.

अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे इन मज़दूरों का कहना है कि उनके संघर्ष से बौखलाकर शासन-प्रशासन अब इस आंदोलन का दमन करने के लिए इसे ‘माओवाद’ का जामा पहनाना चाहती है. अपने इस इरादे को अंजाम देने के लिए सरकार हर संभव प्रयास करने में लगी हुई है. इसी क्रम में स्थानीय मज़दूर नेताओं पर फ़र्ज़ी मुकदमे लगाये जा रहे हैं.

इन सब के बावजूद मज़दूर पीछे हटने को तैयार नही हैं. महिलाएं उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर हर दमन का सामना करते हुए डटी हुई हैं. वो अपने जुझारू तेवरों से सिडकुल के इतिहास में नयी इबारत लिख रहे हैं.

स्थानीय मज़दूरों का कहना है कि देश के अन्य क्षेत्रों की तरह ही उत्तराखण्ड के सिडकुल में भी श्रम कानूनों के सरेआम धज्जियां उड़ायी जा रही हैं. हर जगह से परेशान मज़दूर जब खुद अपने संघर्षो को लड़ रहा है तो उस पर ‘माओवाद’ का ठप्पा लगाकर उसकी आवाज़ को दबाने की कोशिशें की जा रही है. उन्होंने उत्तराखण्ड सरकार से मांग की है कि वो आंदोलन का दमन करने और माओवाद-माओवाद चिल्लाने के बजाए इंटार्क सहित उत्तराखण्ड में चल रहे सभी मज़दूर आंदोलनों की न्यायपूर्ण मांगो को जल्द से जल्द पूरा करे. साथ ही उन्होंने छात्रों-नौजवानों और न्यायप्रिय जनता से अपील करते हैं कि वो इंटार्क के मज़दूरों का साथ देते हुए उत्तराखण्ड सकार की मज़दूर विरोधी नीतियों का मुंहतोड़ जवाब दे.

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