कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

ग्राउंड रिपोर्ट : मोदी जी! बनारस से उजाड़ दी गई दलित बस्ती, कंपकपाती ठंड में अब कहां जाए ये 40 परिवार?

जेबी सहनी कहती हैं कि मोदी जी गरीबी हटाने की बात करते हैं, लेकिन वास्तव में वो ग़रीबों को ही हटा रहे हैं.

“हमारे आदमी लोग काम पर चले गए थे, बच्चे भी घर पर नहीं थे, अचानक से बुलडोजर आया और तोड़फोड़ करने लगा. हमें बिल्कुल समय ही नहीं मिला कि अपना सामान निकाल सकें. हमारा पूरा घर तोड़ दिया गया. मेरे आंखों के सामने हमारा पूरा घर गिर गया. सामान तोड़ दिया गया. हम उनके हाथ-पैर जोड़ रहे थे, लेकिन किसी ने हमारी नहीं सुनी.” इतना कहते ही मनु साहनी फफ़क-फफ़क कर रोने लगती हैं.

मनु साहनी वाराणसी जिले के राजघाट पुल के पास स्थित नई बस्ती की रहने वाली हैं. यहां पर लगभग चालीस परिवार रहता है. इनमें मल्लाह और दलित समाज के लोग शामिल हैं. इस समय यहां पर केवल मिट्टी और प्लास्टिक का ढेर नज़र आ रहा है. घर-गृहस्थी तो कब की टूट चुकी है. यहां पर इस समय ना तो किसी के पास पहनने के लिए कपड़ा है ना खाना पकाने के लिए बर्तन. बच्चों के स्कूल बैग से लेकर लोगों के आधार कार्ड तक सबकुछ एक मलबे के ढेर में बदल गया है.

मनु साहनी बताती हैं, “सब लोग कहते हैं कि मोदी जी अच्छा कर रहे हैं, लेकिन मोदी जी गरीबी नहीं गरीब को ही समाज से हटा रहे हैं. वोट मांगने तो सब आ जाते हैं, लेकिन अब गरीबों को लात (पैर) मारकर भगाया जा रहा है. घर गिर जाने से हम लोगों को खुले आसमान के नीचे सोना पड़ रहा है. लगातार ओस गिर रहा है. इस कारण इस बस्ती के बच्चे बीमार हो रहे हैं.”

इस बस्ती के लोग पिछली दो पीढ़ियों से यहां पर रह रहे हैं. इनका नाम वोटर लिस्ट में हैं. लोगों के पास आधार कार्ड भी है, बस इनका अपना कोई स्थायी ठिकाना नहीं था, इसलिए यहां बस गए.

यहां के एक छोटे से मंदिर के पुजारी और करीब 70 साल के बुजुर्ग मोहन साहनी उर्फ बाबाजी बताते हैं, “हम यहां पर करीब 40 साल से रह रहे हैं, लेकिन सरकार ने बिना किसी नोटिस और बिना किसी सूचना दिए हमारी बस्ती को तोड़कर हमें बेघर कर दिया है. हमारे साथ अन्याय हुआ है. किस परमिशन और किस आधार पर बस्ती को तोड़ा गया है, ये सब हम लोगों को पता नहीं. सरकार ने अपनी मर्ज़ी से किया है या किसी आदमी ने दर्खास्त देकर तुड़वाया है, इन बातों की हमें कोई जानकारी नहीं है.

मोहन साहनी जिस मंदिर में पूजा कर रहे थे उस मंदिर को उजाड़ दिया गया है. उनकी कुटिया को भी नहीं छोड़ा गया. स्थिति ये हो गई है कि मोहन साहनी रात को प्लास्टिक के नीचे सो रहे हैं. अपने मंदिर की ओर इशारा करते हुए मोहन साहनी बताते हैं, “उन लोगों ने मेरा घर उजाड़ दिया कोई बात नहीं, लेकिन उन लोगों ने तो मेरे भगवान का घर भी तहस-नहस कर दिया.

मोहन साहनी के मुताबिक, “जिस जमीन पर हम लोग रह रहे हैं वह जमीन रेलवे की है. लेकिन जमीन कौन खाली करा रहा है हमें इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है. प्रशासन को जमीन खाली कराना था तो हमें बता देते हम लोग अपना सामान निकाल लेते, लेकिन अचानक आए और तोड़फोड़ करने लगे.”

यहां रहने वाला करीब चालीस परिवार मजदूरी और मछली मारकर अपना पेट पालता आया है. अपनी पूरी ज़िंदगी में इन लोगों ने एक छोटा सा आशियाना बनाया था, जिसे पिछले महीने प्रशासन द्वारा गिरा दिया गया है. आज ये सभी परिवार खुले आसमान में रहने को मजबूर हैं.

जिलाधिकारी से नहीं हो पाया संपर्क

इस बाबत वाराणसी के जिलाधिकारी से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया. तब अयोध्या फैसले को लेकर शहर के अधिकारी तैयारियों में व्यस्त थे. इसके अलावा ईद मिलादून नबी और देव दिवाली की वजह से भी अधिकारी से बात नहीं हो पाई.

ग़ैर-जिम्मेदाराना बयान दे रहे जन-प्रतिनिधि

क्षेत्र के सभासद विजय सोनकर का कहना है कि ये जमीन नगर निगम की थी और नगर निगम ने ले लिया. विजय सोनकर बताते हैं कि, ‘इन लोगों (जिनके घर उजाड़े गए हैं) से कई बार कहा गया कि अपना आवास बनवा लें, लेकिन किसी ने हमारी बात नहीं सुनी. अब जब नगर निगम को अपना जमीन खाली कराना था तो उसने करा लिया

बिना किसी नोटिस के बस्ती उजाड़ने के सवाल पर सभासद का कहना है, “इन लोगों से पंद्रह दिन पहले ही जाकर कह दिया गया था कि वो जमीन खाली करके कहीं और चले जाएं, लेकिन इन लोगों को कोई बात समझ में नहीं आता है.”

हालांकि बस्ती में लोग सभासद विजय सोनकर से भी नाराज़ हैं. सोनू साहनी बताते हैं, “हमारे यहां के सभासद विजय सोनकर कभी भी हमारा हाल जानने के लिए नहीं आए. जब हमारा घर गिराया जा रहा था तब भी हम उनको कॉल किए बात करने के लिए, लेकिन उन्होने हमसे बात नहीं की. कई बार हम लोग उनसे आवास के लिए बोले लेकिन हमारी कोई सुनवाई नहीं हुई.”

वे आगे कहते हैं, “कई बार हमलोग आवास के लिए फॉर्म भरे, फॉर्म भरने वाले ने दो चार सौ रुपया भी लिया लेकिन, आज तक हम लोगों को घऱ नहीं मिला. जब बाढ़ में हम लोग डूबने की स्थिति में आ गए थे और हमारे घरों में पानी भर रहा था तब भी हमारे यहां का सभासद हमारा हाल जानने नहीं आया. जब वोट लेना था तो आकर हाथ जोड़कर वोट मांग रहे थे लेकिन अब गायब हैं.”

समाज सेविका जागृति राही स्मार्ट सिटी के कॉन्सेप्ट से निराश दिखती हैं. उनका कहना है, “वाराणसी स्मार्ट सिटी की लिस्ट में शामिल है. कई योजनाएं बनाई गई, लेकिन गरीबों के लिए, सड़क किनारे रहने वालों के लिए, पुल के नीचे रहने वालों के लिए कोई भी योजना नहीं बनाई गई. गरीबों के नाम पर इतने आवास बनते हैं, लेकिन गरीब को कभी वो आवास नहीं मिलता.”

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