कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

जेटली जी! पांच सालों में देश ने बहुत सारे आंदोलन देखे हैं, अब आप क्या चाहते हैं कि नौकरी की मांग करने वाले ‘फसादी आंदोलन’ करें ?

अरुण जेटली ने बीते दिनों कहा था कि अगर देश में बेरोज़गारी की समस्या होती तो अभी तक समाज में अशांति फैल चुकी होती

मोदी सरकार में लंबे समय तक वित्त मंत्री रहे अरुण जेटली इस बार का बजट पेश नहीं कर पाए. वे अमेरिका में ईलाज कराने गए हैं. लेकिन, जब उनके सहयोगी पीयूष गोयल ने बजट पेश किया तो वित्त मंत्री जी अचानक से उत्साहित हो गए और बेरोज़गारी के सवाल पर प्रश्न चिह्न खड़े करने लगे. जेटली जी ने कहा कि अगर देश में रोज़गार की समस्या होती तो पिछले पांच सालों में देश में बड़ा आंदोलन छिड़ गया होता. अब हम जेटली जी को सात ऐसे आंदोलन बता रहे हैं जिसने देश के नौजवानों और सरकारी नौकरी की चाह रखने वाले लोगों का भरोसा सिस्टम से उठा दिया.

 1.एसएससी स्कैम आंदोलन

2018 के फ़रवरी माह में देशभर से आए छात्रों ने दिल्ली में डेरा डाला था. उनका कहना था कि कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षा, जो कि सरकारी नौकरियां देती हैं, में भारी गोलमाल हुई है. छात्रों का कहना था कि 17 से 22 फरवरी 2018 तक हुई इस परीक्षा का प्रश्न पत्र लीक हुआ था और इसमें सरकारी तंत्र के अधिकारियों की मिलीभगत थी. देशभर से आए हजारों छात्रों ने जब अपना प्रदर्शन शुरू किया तो जेटली जी की सरकार ने उनके प्रदर्शनस्थल के आसपास के टॉयलेट तक बंद करा दिए थे. इससे महिला प्रदर्शनकारियों के साथ साथ पुरुषों को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ा था. एक साल बीतने के बाद भी सरकार ने इस मामले में छात्रों की मांग को नहीं सुना है और इसी 7 फरवरी से लगभग 20 हजार छात्र दिल्ली में एकबार फिर से जुट रहे हैं.

2.UPSC आंदोलन

यूपीएससी यानि संघ लोक सेवा आयोग की तैयारी कर रहे छात्र भी दिल्ली के मुखर्जी नगर में हजारों की संख्या में प्रोटेस्ट कर रहे हैं. उनकी मांग है कि सीसैट लागू होने के बाद से हिन्दीभाषी छात्रों को काफी नुकसान हुआ है, जिसकी भरपाई के लिए उन्हें एक्सट्रा अटेम्पट दिए जाएं. अगर जेटली जी इन हज़ारों छात्रों के आंदोलन को बड़ा नहीं मानते तो भगवान उनका भला करें.

3.रेलवे की तैयारी कर रहे छात्रों का आंदोलन

मार्च 2018 में महाराष्ट्र के हजारों छात्रों ने रेलवे में बहाली को लेकर बड़ा आंदोलन किया था. यह ख़बर भी कई दिनों तक अख़बारों की सुर्खियों में थी. सरकार ने इन प्रदर्शनकारी छात्रों पर लाठियां बरसाईं और कई छात्रों को गिरफ़्तार भी किया. एनडीटीवी की एक ख़बर के मुताबिक दिल्ली में प्रदर्शन कर थक चुके छात्रों का कहना था कि उन्होंने मध्य रेलवे में इंटर्नशिप की है. पहले इंटर्नशिप करने वाले छात्रों को नौकरी की गारंटी होती थी, लेकिन उन्हें नौकरी नहीं दी गई. छात्रों का कहना था कि रेलवे ने उन्हें नौकरी का आश्वासन भी दिया था. इस प्रदर्शन में छात्रों ने बड़े पैमाने पर रेल चक्का जाम भी किया, जिससे रेल परिवहन पर गहरा असर पड़ा था. जेटली जी अगर इन हजारों छात्रों के आंदोलन को आंदोलन नहीं मानते तो उन्हें 21 तोपों की सलामी.

4.आशा/आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का आंदोलन

देश के अलग अलग हिस्सों से हजारों की संख्या में आशा कार्यकर्ता लगातार दिल्ली में प्रदर्शन करते रहे हैं. हाल ही में बिहार की लाखों आशा कार्यकर्ताओं ने लगभग 1 महीने तक आंदोलन किया था. इनकी मांग थी कि सरकार इन्हें स्थायी नौकरी दे और इन्हें मिलने वाली मानदेय राशि को वेतनमान में बदलकर न्यूनतम आमदनी, 18 हजार रुपए प्रतिमाह की जाए. सरकार इनकी मांगे लगातार अनसुनी करती रही है और 50 प्रतिशत मानदेय में वृद्धि करने का दावा करती है. जबकि आशा संघ के नेताओं के मुताबिक असलियत यह है कि अभी आशा कार्यकर्ताओं की मासिक आमदनी बमुश्किल 2 हजार से ज्यादा की नहीं है. आंगनबाड़ी सेविका-सहायिकाओं का भी यही हाल है. अगर सरकार देश की इन लाखों महिलाओं के आंदोलन को छोटा मानती है तो सच में देश के अच्छे दिन आ गए हैं शायद.

5.रसोईया संघ की हड़ताल

सरकारी स्कूलों में मिड डे मील बनाने वाले रसोईया भी इन पांच सालों में आंदोलन करते रहे हैं. उनकी मांग है कि सरकार उनसे 12 महीने काम कराकर मात्र 10 महीने का ही पैसा देती है. इन 10 महीने में भी उन्हें 1,250 रुपए प्रति माह दिए जाते हैं. बिहार में आज भी लगभग तीन हफ़्ते से इन रसोईयों की हड़ताल जारी है. बिहार में भाजपा-जदयू की सरकार ने आजतक इनसे बात करना भी जरूरी नहीं समझा है. पूरे प्रदेश में मिड डे मील योजना ठप पड़ी है, लेकिन सरकार का ध्यान इस पर नहीं जा रहा. इसके उलट सरकार ने प्रदर्शन करने वाले रसोइयों को नौकरी से हटाने का आदेश जारी कर दिया है. अगर इस लोकतंत्र में अपने हक की आवाज़ उठाने वाले लोगों को नौकरियों से हटाया जा रहा है और अरुण जेटली जी इसे बड़ा आंदोलन नहीं मानते तो ये देश के लिए दुर्भाग्य की बात है.

6.अन्नदाताओं का आंदोलन

देश के किसानों ने इन पांच सालों में कई आंदोलन किए हैं. ताजा मामले को देखें तो 2 अक्टूबर 2018 को हज़ारों किसानों ने दिल्ली का रूख किया था. लेकिन, महात्मा गांधी की जयंती के दिन भी जेटली जी और नरेन्द्र मोदी की सरकार ने उनके ऊपर लाठियां बरसाईं. सरकार के इस दमनकारी कदम से कई किसान गंभीर रूप से घायल हो गए. ये सभी किसान अपने फ़सलों के सही दाम और कर्ज़माफ़ी को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे. 2018 के मार्च महीने में भी लगभग 50 हजार किसानों ने महाराष्ट्र में आंदोलन किया था.

7.’13 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम

देश के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की बहाली में आरक्षण की अनदेखी को लेकर भी इन दिनों काफी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. विश्वविद्यालयों में पहले से लागू 200 प्वाइंट रोस्टर प्रणाली को ख़त्म कर यूजीसी ने 13 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम लागू किया है. इससे पिछड़ी जाति के उम्मीदवारों को काफ़ी नुकसान हो रहा है. विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर की बहाली के लिए पहले विश्वविद्यालय को एक ईकाई मानकर नियुक्ति की जाती थी, लेकिन अब विभाग को ईकाई माना जा रहा है. इसे लेकर देशभर में ओबीसी-एससी-एसटी श्रेणी के उम्मीदवारों में काफी आक्रोश है. कई विपक्षी दलों के नेता भी इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं और सरकार से पूर्ववत 200 प्वाइंट रोस्टर लागू करने के लिए कानून बनाने की मांग कर रहे हैं. हाल ही में बिहार में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने भी संसद मार्च किया था. देशभर के पिछड़ी जाति के लोग 13 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम के ख़िलाफ़ आक्रोशित हैं.

भीमा कोरेगांव हिंसा-

31 दिसंबर 2017 को महाराष्ट्र के पुणे में हुई एक हिंसा में दलितों पर बर्बर तरीके से हमले किए गए. इस घटना ने भी देश में उबाल पैदा कर दिया था.

मॉब लिंचिंग-

मोदी सरकार के आने के बाद देश के पास यह नया शब्द आया है. भीड़ द्वारा हमले के शिकार देश के दलित-पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग होते रहे हैं. देश के लगभग हर हिस्से से मॉब लिंचिंग की घटना बीते पांच सालों में सामने आई है, लेकिन इन पर कार्रवाई करने की बजाय भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार के अहम नेता इन घटनाओं को अंजाम देने वालों के साथ खड़े दिखे हैं.

देश में प्रदर्शनों की फ़ेहरिस्त काफ़ी लंबी है. कोई नौकरी की मांग कर रहा है तो कोई कॉन्ट्रैक्ट पर की गई बहाली को नियमित करने की मांग कर रहा है. हर रोज कहीं ना कहीं आंदोलन हो रहा है. इसके बावजूद भी अगर जेटली जी इन आंदोलनों को ख़ारिज़ करते हैं तो या तो वे सच को दबाना चाह रहे हैं या फ़िर छात्रों से यह आह्वान कर रहे हैं कि जबतक कोई बड़ा फसादी आंदोलन नहीं होता सरकार इन मांगों को जरूरी नहीं समझती. जेटली का यह बयान देश के सिस्टम के लिए चिंता की बात है.

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