कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का 95 साल की उम्र में निधन

आपातकाल के दौरान अपने निर्भिक तेवरों के लिए जाने गए नैयर लेखन के ज़रिेए पत्रकारों के आदर्श बने रहे

कुलदीप नैयर का जन्म 14 अगस्त 1924 को सियालकोट (अब पाकिस्तान का हिस्सा) में हुआ था। उनकी स्कूली शिक्षा सियालकोट में हुई। बाद में उन्होंने लाहौर के एक महाविद्यालय से वकालत की डिग्री हासिल की। आगे चलकर उन्होंने दर्शनशास्त्र में पीएचडी भी की। अमेरिका से उन्होंने अपनी पत्रकारिता की पढ़ाई की।

विभाजन के समय उन्होंने भारत में रहने का फैसला किया और यहीं बस गए। लंबे समय तक भारत सरकार के प्रेस सूचना अधिकारी के पद पर कार्य करने के बाद वे यूएनआई, पीआईबी, ‘द स्टेट्समैन’, इंडियन एक्सप्रेस, के साथ काफी समय तक जुड़े रहे।

नैयर लगभग 25 सालों तक ‘द टाइम्स’ लंदन के संवाददाता भी रहे। इसके साथ ही वे 14 भाषाओं में देश-विदेश के ’80’ नामी अखबारों में कॉलम और एप-एड भी लिखते रहे हैं।

अपने लेखन के ज़रिये तीन पीढ़ियों का नेतृत्व करने वाले नैयर सभी पत्रकारों के आदर्श रहे हैं। उन्हें आपातकाल के समय अपने निर्भीक तेवरों के लिए जाना जाता है। भारतीय आपातकाल (1975-77) के समय उन्होंने इंदिरा गांधी की सत्ता के सामने झुकने से मना कर दिया था। इस वजह से उन्हें जेल भी जाना पड़ा था।

उन पर समय-समय पर ‘हिन्दू विरोधी’ होने के आरोप भी लगते रहे हैं।

नैयर की लेखनी का असर सरकारों पर पड़ता रहा है। उन्होंने भारत सरकार की कार्यप्रणाली और समसामयिक राजनीतिक घटनाक्रम पर कई किताबें लिखी हैं। उनकी लिखी किताब “भारत नेहरू के बाद” सबसे प्रचलित रही है। उनकी कुछ और चर्चित किताबों के नाम  ‘बियॉन्ड द लाइन्स’, ‘वाल एंट वाघा’, इंडिया हाउस’, ‘स्कूप’ आदि हैं। ‘बियॉन्ड द लाइन्स’ के नाम से प्रकाशित उनकी आत्मकथा काफी चर्चित रही है।

23, नवंबर 2015 को पत्रकारिता के जाने-माने अवार्ड “रामनाथ गोयनका” अवार्ड से भी उन्हें नवाज़ा गया। साथ ही साथ देश-विदेश में उन्हें कई सम्मानों से नवाज़ा जाता रहा है। 1990 में वे ब्रिटेन के उच्चायुक्त नियुक्त किये गए। इसके साथ ही 1996 में भारत सरकार की ओर से संयुक्त राष्ट्र संघ को भेजे गए प्रतिनिधि मंडल के सदस्यों में वे भी शामिल थे। अगस्त 1997 में वे राज्यसभा में भी नामांकित किये गए थे। नैयर का जाना विश्व पत्रकारिता के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

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