कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

अलग-अलग विचारों का गुलदस्ता है हमारा समाज, किसी एक पहचान को नहीं थोपा जा सकता: जावेद अख्तर

"जिस तरह से इस्लाम के भीतर आपको वली, ख़लीफा और पैगम्बर की बातों को मानने का दबाव रहता है, उसी तरह अगर आप मोदी जी को नहीं मानते हैं तो फिर आप ठीक हिन्दू नहीं हैं."

“ये ग़ुलाम अपने आक़ाओं के इशारे पर इस तरह नाचेंगे कि सारे ख़्यालात की सभी बारात, सारे ज़ज्बात के शीशा घर, टूटकर रह जाएंगे. हर तरफ़ ज़हन की बस्तियों में यही देखने को मिलेगा कि एक अफ़रा-तफ़री मची है, मुझे तो ये लगता है कि किसी ने ये साजिश रची है.” ये बातें लेखक व सुप्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर ने कही है. जावेद अख्तर देश की मौजूदा स्थिति और अल्पसंख्यकों पर होने वाले ज्यादतियों पर बात कर रहे थे.

जावेद अख्तर रखशांदा जलील की किताब “बट यू डॉन्ट लुक लाइक ए मुस्लिम” के विमोचन के मौके पर बोल रहे थे. कारवां -ए-मोहब्बत ने उनके संबोधन का विडियो जारी किया है. जिसमें जावेद अख्तर कहते हैं, “हममें से किसी की भी पहचान एक नहीं है. हमलोग भिन्न प्रकार के पहचान के एक गुच्छे के समान हैं. लेकिन कट्टरपंथी ये कहते हैं कि नहीं यह आपकी बेसिक पहचान है और यही सबसे महत्वपूर्ण है. यह ग़लत है. राजनीति के भीतर धर्म और धर्म के भीतर राजनीति घुस गई है. जिस तरह से इस्लाम के भीतर आपको वली, ख़लीफा और पैगम्बर की बातों को मानने का दबाव रहता है, उसी तरह अगर आप मोदी जी को नहीं मानते हैं तो फिर आप ठीक हिन्दू नहीं हैं.”

कारवां ए मोहब्बत द्वारा जारी किए गए विडियो में जावेद अख्तर ने आगे कहा है, “आज यह बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है कि आख़िर हिन्दू होने की पहचान क्या है…कुछ लोग मुस्लिम मुल्ला की तरह सोचने लगे हैं. वे औरों के लिए कुछ नियम निर्धारित कर देना चाहते हैं. वे यह बताना चाहते हैं कि यही (उनके विचार) एक मात्र सही है और बाकी सबकुछ ग़लत है.”

आगे जावेद अख्तर ने कहा है, “अल्पसंख्यकों की हमेशा एक खास पहचान रही है. बहुसंख्यकों को पहचान की जरूरत नहीं होती. बहुसंख्यक लोगों की पहचान उस समुदाय के अच्छे लोगों के काम के आधार पर की जाती है, जबकि अल्पसंख्यकों की पहचान उस समुदाय के कुछ गिने-चुने लोगों के बुरे कामों द्वारा तय की जाती है. 15 करोड़ की जनसंख्या में 10 या 15 आदमी कट्टरपंथी या पागल निकल जाता है, तो यह पूरे समुदाय की जवाबदेही तो होती नहीं है. किसी भी समुदाय में आपको पागल मिल जाएंगे. तो यह बोझ (अल्पसंख्यकों पर) डालना हर तरह से ग़लत है. इसकी सफ़ाई देना ग़लत है, इसलिए क्योंकि यह इल्ज़ाम ग़लत है.”

बता दें कि जावेद अख्तर देश और समाज की समकालीन परिस्थितियों पर मुखरता से लिखते बोलते रहे हैं.

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