कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

ये मत पूछिए मोदी नहीं तो कौन, ये पूछिए मोदी फिर आएगा तो क्या होगा?- हर्ष मंदर

2019 में 2014 वाला विकास का पेड़ कट चुका है. उसके ‘अच्छे दिन’ के हरे पत्ते सूख कर झड़ चुके हैं. जो बचा है वो सिर्फ़ नफ़रत की शाखाएं हैं और जहर व अलगाववाद की जड़े हैं.

‘अगर मोदी नहीं तो कौन’, अक्सर कई लोग यह सवाल पूछते हैं. इस सवाल के भी कई जवाब हो सकते हैं. मगर 2019 के लोकसभा चुनाव में वोट डालते वक्त यह हमारा मुख्य सवाल नहीं होना चाहिए. बल्कि हमें पूछना चाहिए कि ‘मोदी दोबारा आएं, तब क्या होगा?’

यह कोई आम चुनाव नहीं है. यह सत्ता हासिल करने की एक ख़तरनाक होड़ है, जिसके लिए राजनीतिक दल अब हर हद से गुज़र जाएंगे. इस चुनाव में आपका वोट तय करेगा कि क्या हिंदुस्तान एक संवैधानिक, धर्म निरपेक्ष, जनतांत्रिक राष्ट्र के रूप में जीवित रहेगा या उसे एक बहुसंख्यकवादी हिन्दू राष्ट्र में तब्दील कर दिया जाएगा.

2014 में, हर तीन में से एक वोटर ने अपना नसीब, प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी के हाथों में सौंप दिया था. इस बात का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा. उनके पास गुजरात में बारह साल बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री का तजुर्बा था. दो चीज़ें हैं जो मोदी के गुजरात के नेतृत्व की याद दिलाती हैं.

पहला: मोदी की नज़रों के नीचे उनके राज्य में  2002 की जो खूंरेजी हुई और औरतों और बच्चों के साथ जो बर्बरता हुई, शायद हमें पार्टिशन के दंगों के अलावा मुसलमानों के खिलाफ़ ऐसा वहशीपन सुनने को नहीं मिलता है. आज तक मोदी ने इस नरसंहार के लिए कोई शर्मिंदगी और पश्चाताप नहीं जताया है. यह इसकी सबसे कड़वी यादों में से एक है. बल्कि उन्होंने इसके बाद एक गौरव यात्रा निकाली, जिसमें मुसलमानों के लिए वही नफरत के जहरीले बोल बोले गए थे, जो मौजूदा चुनाव में सुन रहे हैं. इन 12 सालों में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच गुजरात में जो सांप्रदायिक नफ़रत और ख़ौफ की खाई खोदी गई है, उसने लगभग आधे से ज़्यादा विस्थापित लोगों का अपने घर लौटने का ख़्वाब नामुमकिन बना दिया है. यह न्याय नहीं धोखा है.

गुजरात दंगे

दूसरा: गुजरात में उनका कार्यकाल बड़े-बड़े उद्योपतियों के व्यापार अनुकूल आर्थिक विकास से जुड़ा हुआ है. सरकार ने कारोबार के लिए पूंजीपतियों को मोटी-मोटी सब्सिडी तो दे दे दी, लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य पर बहुत कम खर्च किया, जिसके चलते असमानताएं आसमान पर पहुंच गई हैं.

इसमें कोई शक नहीं है कि उनके वोटरों का एक तबका 2014 में सिर्फ़ उनके सांप्रदायिक तगमों से मोहित हो उठा था. मगर मुझे यकीं है कि ज़्यादातर समर्थक उनके ‘अच्छे दिन’ के वादे से प्रभावित हुए होंगे. वो एक दुरुस्त अर्थव्यवस्था, बेहतर रोज़गार और भविष्य की कामना लेकर मोदी से जुड़े थे. वो उनमें एक ऐसा नेता भी देखते थे, जो क्रोनी पूंजीवादी भ्रष्टाचार से लड़ने की ताकत रखता हो.

2019 में इस तस्वीर में कोई ख़ास फ़र्क नहीं आया है. आज मोदी नौकरियों, किसानों की समस्याओं और आर्थिक उन्नति की बात तक नहीं कर रहे हैं. इसकी वजह यह है कि अर्थव्यवस्था स्पष्ट रूप से पहले से ज़्यादा जर्जर स्थिति में है, रुपया गिरता ही जा रहा है, कृषि संकट भी पहले के मुताबिक गंभीर हो गया है, राष्ट्रीय सुरक्षा के बारे में भी सार्वजनिक निर्णयों में क्रोनी पूंजीवाद स्पष्ट है, और सबसे खराब, पिछले पांच वर्षों में कोई रोजगार के अवसर नहीं बढ़े हैं. बल्कि हम फ़िलहाल एक ऐसी बेरोजगारी झेल रहे हैं, जो हमें 45 साल पीछे, 1971 के दौर में ले गई है.

प्रतीकात्मक छवि

हर मायने में, 2014 के अच्छे दिनों के वादों का वो हरा-भरा पेड़ 2019 में सूख गया है. आज मोदी के पास  अपने वोटरों के लिए, चौड़ी छाती वाले खोखले हिंदुत्वादी राष्ट्रवाद के अलावा कुछ भी नहीं है. भारत बंटवारे के बाद कभी भी इतना नहीं बंटा है; उसके अल्पसंख्यक कभी भी ऐसे भय के साथ जीने के लिए मजबूर नहीं थे. यह गाय और लव जिहाद के नाम पर घृणा फैलाने की प्रवृत्ति से प्रेरित है; इसे भाजपा के वरिष्ठ नेताओं द्वारा अभद्र भाषा के उच्चारण से सींचा गया है, जिसमें अब प्रधानमंत्री की भी रोज़ तेजी से भागीदारी बढ़ रही है.

शायद इस वजह से मेरा सवाल ‘अगर मोदी नहीं तो कौन’ की बजाय  ‘अगर ‘मोदी दोबारा आए, तब क्या होगा?’, है. 2019 में 2014 वाला विकास का पेड़ कट चुका है. उसके ‘अच्छे दिन’ के हरे पत्ते सूख कर झड़ चुके हैं. जो बचा है वो सिर्फ़ नफ़रत की शाखाएं हैं और जहर व अलगाववाद की जड़े हैं. मोदी को दिया गया हर वोट इन्हीं शाखाओं को बढ़ाने और इस सांप्रदायिक नफ़रत की जड़ को गहरा करने के समान है. यदि उन्हें पद से हटा भी दिया जाता है, तो सांप्रदायिक सद्भाव को दोबारा बहाल करने, और भारत को कल्याणकारी राज्य बनाने का काम मुश्किल और लंबा होगा.

गुजरात के ऊना में, दलित पुरुषों पर जुलाई 2016 में गौ-रक्षकों द्वारा हमला किया गया था.

जो कोई भी उनके बाद सत्ता हासिल करेगा, हमें यह मांग उससे करनी ही होगी. लेकिन अगर नरेंद्र मोदी को 2019 में वापस चुना जाता है, तो भारत का धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र एक बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद के पैरों तले कुचल दिया जाएगा, उसे एक हिंदू राष्ट्र द्वारा बदल दिया जाएगा, जिसमें अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में रहने के लिए मजबूर किया जाएगा.

1947 के बाद से कोई चुनाव नहीं हुआ है, जहां इतना कुछ दांव पर था.

(अलीशान जाफरी द्वारा अनूदित )

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