कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

पत्रकार को फेसबुक पर प्रगतिशील विचार लिखने के कारण संपादक ने नौकरी से निकाला

इस नौजवान पत्रकार का कसूर सिर्फ प्रगतिशील विचारधारा से जुड़ा होना था।

एक 22 साल का नौजवान पत्रकार जो इसी साल “भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) दिल्ली” से हिंदी पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा करके पत्रकारिता के गर्भ से बाहर आया था। वह 11 मई, 2018  को Roar हिंदी में मिली अपनी पहली नौकरी पर बड़ा इतरा रहा था।

नौजवान ने छात्र जीवन में समाज को तोड़ने और बर्बाद करने वाले विचारों के खिलाफ खूब संघर्ष किए थे। वह दिल्ली में चल रहे प्रगतिशील आंदोलनों में शामिल होता और उनके बारे में सोशल मीडिया पर भी खूब लिखता। उसका लिखा हुआ वाकई असरदार होता था और तंगख़याली लोगों को खासा परेशान करता था।

साभार: फेसबुक

नौकरी मिली तो अपने मीडिया हाउस के लिए दिल लगाकर खूब काम करता। समय मिलने पर अपने प्रगतिशील विचारों को अपनी खुद की फेसबुक टाइमलाइन पर भी लिखता। लेकिन उसको यह बिल्कुल नहीं पता था कि खुद की फेसबुक प्रोफाइल पर लिखने से उसकी नौकरी चली जाएगी। फेसबुक पर प्रगतिशील विचारों को लिखने भर के कारण अपनी नौकरी से हाथ धोने वाले उस नौजवान पत्रकार का नाम है मुरारी त्रिपाठी।

 

क्यों गई मुरारी की नौकरी?

 

 

साल 2018। अप्रैल के पहले सप्ताह में रोरनाम के मीडिया हाउस ने मुरारी को कैंपस प्लेसमेंट्स में अपने यहां काम करने के लिए चुन लिया। जिसके बार मुरारी ने “रोर हिंदी” में बतौर स्टाफ राइटर11 मई, 2018 को ज्वाइन किया। इंटरव्यू में उसे बताया गया था कि रोर हिंदी अभी खुद को स्थापित करना चाहता है, इसलिए नए प्रयोग करने और लेखन के लिए मनचाही तो नहीं लेकिन ठीक-ठाक छूट देने के लिए तैयार थी। जब उसने अपनी नौकरी शुरू की तो पता चला रोर हिंदी के संपादक मिथिलेश कुमार सिंह एक राजनीतिक विचारधारा को मानने वाले हैं। उसे इस बात से कोई दिक्कत नहीं हुई, क्योंकि राजनीतिक रूप से वह भी एक विचारधारा को मानता है और एक लोकतंत्र में सबको ऐसा करने का पूरा हक़ है। लेकिन जैसे ही संपादक को मुरारी की विचारधारा का पता लगा, उसने मुरारी पर तंज कसने शुरू कर दिए।

मुरारी अपने आपको वामपंथ के नजदीक पाते हैं। उसकी विचारधारा को लेकर उसके और संपादक के बीच कई विषयों पर घंटों लंबी बहसें होने लगीं। उसका संपादक उसे बार-बार वामपंथ को मरी हुई और घटिया विचारधारा बताता। एक बार जब कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन के ऊपर संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट आई तो मुरारी को इस मामले के ऊपर एक वैचारिक लेख लिखने के लिए कहा गया। उसे यह लेख हिन्दू राष्ट्रवादी नजरिये से लिखने के लिए कहा गया क्योंकि संपादक का मानना था कि कश्मीर में रहने वाले मुसलमानों के दिलों में पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति होती है।

मुरारी ने संपादक से अपनी लंबी बहस में कश्मीर के इतिहास और उससे जुड़े तथ्यों का हवाला देकर लेख लिखने से मना कर दिया। इस घटना के बाद से संपादक ने उससे ऐसे लेख लिखने लगभग बंद करवा दिए और उसे साहित्यकारों, राजनीतिज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं इत्यादि के जन्मदिन और स्मृति दिवसों पर विशेष लेख लिखने की जिम्मेदारी दे दी। नई जिम्मेदारी पाकर भी वह खुश था। वेबसाईट पर लिखने के साथ-साथ वह सोशल मीडिया पर भी लगातार अपना प्रगतिशील नज़रिया लिखता रहता था।

अपनी तंगदिमागी सोच के कारण कई बार संपादक ने उसे फेसबुक पर लिखने से रोका। वह उसे बार-बार कहता था कि जब तक रोर हिंदी से जुड़े हुए हो, तब तक सोशल मीडिया पर किसी खास विचारधारा के बारे में अपनी पर्सनल फेसबुक पर मत लिखो। जबकि वह खुद दक्षिणपंथी विचारधारा को बढ़ावा देने वाले अपने लेखों, विचारों और कार्यक्रमों  को अपनी फेसबुक पर लिखता था। इतना ही नहीं इस वर्ष हिंदी दिवस के अवसर पर वेबसाइट पर संपादक ने एक संपादकीय लेख शेयर किया था, जो पूरी तरह से हिंदी-हिन्दू-हिंदुस्तानके रंग में डूबा हुआ था। मुरारी अपना काम पूरी ईमानदारी से करता रहा और दूसरी तरफ फेसबुक पर भी लिखता रहा।

इस बीच 17 सितम्बर के दिन उसके पास ऑफिस से मेल आया। उस दिन वह छुट्टी पर था। यह उसकी अब तक की पहली छुट्टी थी। मेल में  भेजे गए अर्जेंट नोटिस में उसके ऊपर ओपेन पोलिटिकल एक्टिविज्मकरने का आरोप लगाया गया और कहा गया कि सात दिनों के भीतर उसे यह साफ़ करते हुए जवाब भेजना होगा कि आखिर उसे नौकरी से क्यों न निकाला जाए!

उसने अगले कुछ ही घंटों में जवाब भेज दिया, जिसमें लिखा कि सोशल मीडिया उसका व्यक्तिगत स्पेस है और जो वह वहां लिखता है उससे उसके पेशेवर जीवन का कोई लेना-देना नहीं है। इसके अलावा उसने कंपनी की कोई लिखित सोशल मीडिया नीतियां, कॉन्ट्रैक्ट और कोड ऑफ़ कंडक्ट में भी ऐसा कहीं नहीं लिखा होने की बात कही। इसके अलावा उसने यह भी लिखा कि अगर कंपनी को कोई परेशानी है, तो वह अपने सोशल मीडिया अकाउंट से कंपनी का नाम हटा सकता है।

इसके बाद कंपनी ने 24 सितंबर को उसपर कार्यवाही करने की बात कही और फिर 24 सितंबर को संपादक ने उसे अपने केबिन में बुलाकर कहा कि अगर वह माफ़ी मांग ले और सोशल मीडिया पर मौजूद अपनी सभी पुरानी पोस्ट डिलीट कर दे तो कंपनी उसे नौकरी से नहीं निकालेगी। मुरारी ने ऐसा करने से मना कर दिया, तो संपादक महोदय ने कोई नई नौकरी खोज लेने की बात कही। आगे 28 सितंबर के दिन संपादक ने उसे दोबारा मेल भेजा, जिसमे लिखा था कि कंपनी उसकी सेवाएं रद्द कर रही है और अब काम पर आने की जरूरत नहीं है। मुरारी ने भी मेल करके कंपनी को उसके सुनहरे भविष्य के लिए शुभकामनाएं भेज दीं और अपना बैग लेकर घर चला आया। अभी तक इस महीने की तनख्वाह उसे नहीं मिली है। संपादक ने जल्द ही तनख्वाह भेजने का वादा किया है।

नौकरी से निकाले जाने पर मुरारी ने न्यूजसेंट्रल को बताया,

“मैंने कई सारे ऐसे देशी-विदेशी क्रांतिकारियों के बारे में पढ़ा है, जिन्होंने पत्रकारिता को अपना पेशा बनाकर सच के हक़ में लड़ाई लड़ी। उनमें से कई कामयाब हुए तो कई नाकामयाब। इनमें से ही एक थे- गणेश शंकर विद्यार्थी। उन्होंने अपने अखबार प्रतापके संपादकीय में लिखा था कि सत्य का पक्ष लेना उनका आदर्श है और इस आदर्श की मृत्यु उनकी मृत्यु है। वहीं कार्ल मार्क्स का कहना था कि एक लेखक और पत्रकार को उतना ही कमाना चाहिए जितने में वह जीवित रहकर अपना काम करता रहे, उसे कभी भी कमाने के लिए लिखना और जीवित नहीं रहना चाहिए। इन सब चीजों ने मुझे पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया था।

मैंने जाना कि सत्य, न्याय और समानता केवल कुछ शब्द नहीं हैं। ये नजरिए हैं और पत्रकारिता का काम इनका विस्तार करना है। इसलिए ही मैं पत्रकारिता में आया था ताकि पूरी ईमानदारी से समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया जाए। लेकिन अब मेरी नौकरी जा चुकी है। अभी सिर्फ मुझे ही नहीं, भारत की सबसे बड़ी समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने 300 गैर-पत्रकारों को 29 सितंबर के दिन नौकरी से निकाला है।”

मुरारी के साथ जो हुआ है वो वाकई चिंताजनक और निंदनीय है। मीडिया में मौजूद तंगदिमागी लोग आजादख़याल युवाओं का गला घोटने में लगे रहते हैं। पर आज भी पत्रकारिता जैसे पेशे की इज्जत और पवित्रता मुरारी जैसे प्रगतिशील पत्रकारों की वजह से है, मिथिलेश सिंह जैसे संपादकों की वजह से नहीं।

(स्टोरी मुरारी से बातचीत और पुख्ता सबूत देखने के बाद लिखी गई है। रोर हिंदी के सम्पादक मिथिलेश सिंह से भी बात करने की कोशिश की गई थी, लेकिन उन तक पहुंचा नहीं जा सका। उनका वर्ज़न आने पर स्टोरी को अपडेट कर दिया जाएगा)

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