कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

एक और क़दम स्वतंत्र मीडिया ख़त्म करने की ओर, 7 लाख सब्सक्राइबर्स वाले पलपल न्यूज़ चैनल को यूट्यूब ने किया बंंद

वंचित वर्गों की आवाज़ के रूप में जाना जाने लगा था ये यूट्यूब चैनल

बीते 22-23 सिंतबर को दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में पत्रकारों पर लगातार हो रहे हमलों को लेकर दो दिवसीय अधिवेशन हुआ था जिसमें वक्ताओं ने सरकार का मीडिया विरोधी चेहरा उजागर किया था। उनका कहना था कि कॉरपोरेट मीडिया अब सरकारी मीडिया हो गया है और वहां सरकार की नाकामियों पर सवाल करने पर पत्रकारों को निकाल दिया जाता है। इसलिए जनता को सच बताने के लिए स्वतंत्र रूप से सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जाए।

ऐसा ही काम दो युवा खुशबू अख्तर और नदीम कर रहे थे। उन्होंने डेढ़ साल पहले पलपल न्यूज़ नाम से एक यूट्यूब चैनल बनाया था जो पीड़ितों, शोषितों, बहुजनों और अल्पसंख्यकों की आवाज़ के रूप में जाना जाने लगा था। चैनल को चलाने वाली खुशबू अपने चैनल के माध्यम से सरकार की नाकामियों को लगातार जनता तक पहुंचा रहीं थी। चैनल को लोग बहुत पसंद कर रहे थे और सात लाख से ज्यादा सब्‍सक्राइबर हो गए थे। लेकिन यूट्यूब ने इस चर्चित चैनल को 25 सिंतबर को बंद कर दिया है वो भी बिना कोई नोटिस दिए।

वैकल्पिक और स्वतंत्र मीडिया को बंद कराने की कड़ी में यह ताज़ा मामला है। इस मामले को लेकर न्यूज़सेंट्रल24×7 से अपनी बातचीत में खुशबू अख्तर ने कहा-

“सरकार कॉर्पोरेट मीडिया को तो कुछ कहती नहीं। सिर्फ स्वतंत्र और वैकल्पिक मीडिया को बंद करने में लगी हुई है क्योंकि यही लोग सरकार की असलियत लोगों तक पहुंचा रहे हैं। मैंने और नदीम ने दिन-रात एक करके चैनल को खड़ा किया था। 7 लाख लोगों ने हमारी स्वतंत्र पत्रकारिता पर भरोसा करके हमारे चैनल को सब्सक्राइब किया था। लेकिन यूट्यूब ने एक झटके में बिना किसी नोटिस के हमारे चैनल को बंद कर दिया है। जाहिर है ऐसा सरकार के इशारे पर हुआ है। सरकार हर उस आवाज़ को बंद कर देना चाहती है जो सरकार की असलियत जनता तक पहुंचाती हो। यूट्यूब ने हमें दो महीने के पैसे भी नहीं दिए हैं। इन्हीं पैसों से हमारा घर चल रहा था। मैं यूट्यूब को लगातार मेल भेज रही हूँ लेकिन उनका कोई जवाब नहीं आया है। इस मामले को लेकर मैं कोर्ट जाऊंगी।”

गौरतलब है कि बीते चार वर्षों में कई पत्रकारों को काम करने से लगातार रोकने कि कोशिश की जा रही है। लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाने वाले मीडिया को अगर इस तरह से अपाहिज बनाने की प्रक्रिया चलती रही तो लोकतंत्र पर गहरा इसका असर और गहरा होता जाएगा।

 

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